5.8 किसी व्यक्ति को इबादत और सार्वजनिक सेवाओं के लिए काम पर रखना
5.8 Hiring Someone to perform Worships and Public Services
इजारे (किराये/मज़दूरी के अनुबंध) की परिभाषा यह है कि यह एक ऐसा अनुबंध है जिसमें श्रम के फल के बदले मुआवज़ा तय किया जाता है, और शर्त यह है कि उससे मिलने वाला लाभ नियोक्ता पूरी तरह प्राप्त कर सके। इससे हम यह समझते हैं कि इजारा हर उस लाभ के लिए जायज़ है जिसे नियोक्ता कर्मचारी से पूरी तरह हासिल कर सके। यह लाभ किसी नौकर जैसे व्यक्ति का हो सकता है, या किसी कारीगर के काम का, जब तक कोई शरई दलील न हो जो ऐसे लाभ को हराम ठहराती हो। इसकी वजह यह है कि मूल रूप से चीज़ें जायज़ होती हैं, और लाभ भी उन्हीं चीज़ों में से एक है। यह कहना ग़लत है कि यहाँ एक ऐसा अनुबंध या लेन-देन है जिसे शरीअत की ओर से मूल रूप से प्रतिबंधित होना चाहिए न कि जायज़। यह ग़लत है, क्योंकि अनुबंध स्वयं इजारा है, लाभ नहीं। लाभ वह चीज़ है जिस पर लेन-देन होता है और जिस पर अनुबंध लागू होता है, इसलिए लाभ स्वयं कोई लेन-देन या अनुबंध नहीं है। अतः जब किसी लाभ के बारे में मनाही का कोई उल्लेख न हो, तो उस पर इजारा जायज़ है, चाहे उसकी इजाज़त देने वाला कोई विशेष पाठ मौजूद हो या नहीं। इसलिए किसी व्यक्ति के लिए जायज़ है कि वह किसी पुरुष या स्त्री को अपने लिए टाइपराइटर पर एक निश्चित मज़दूरी के बदले कुछ निश्चित पृष्ठ टाइप करने के लिए किराये पर रखे, क्योंकि यह एक ऐसे लाभ पर इजारा है जिसके बारे में मनाही का कोई उल्लेख नहीं है। अतः इस पर इजारा जायज़ है, भले ही उसकी इजाज़त का कोई पाठ न आया हो। यह भी जायज़ है कि किसी व्यक्ति को एक निश्चित समय में एक निश्चित काम के लिए नापने और तौलने के लिए किराये पर रखा जाए। अबू दाऊद ने सुवैद बिन क़ैस की हदीस में रिवायत किया है, जिन्होंने कहा: "नबी (ﷺ) हमारे पास (बाज़ार में) आए, आपने हमसे सौदा किया और हमने आपको बेचा। और वहाँ एक व्यक्ति मज़दूरी पर तौल रहा था। नबी (ﷺ) ने फ़रमाया: 'तौलो और वज़न को झुका दो (तराज़ू का पलड़ा भारी करो)।'" अतः यह इजारा जायज़ है और इसे जायज़ ठहराने वाला एक पाठ मौजूद है। लेकिन जहाँ तक इबादतों का सवाल है, चाहे वे फ़र्ज़ हों या नफ़्ल, उनकी अलग से जाँच करनी होगी। यदि उनका लाभ उस व्यक्ति से आगे नहीं जाता जो उन्हें करता है, जैसे स्वयं के लिए हज करना और अपनी ज़कात स्वयं देना, तो उसके लिए इसके बदले में पारिश्रमिक लेना जायज़ नहीं है, क्योंकि पारिश्रमिक किसी लाभ का बदला होता है और इन कामों में स्वयं के सिवा किसी और के लिए कोई लाभ नहीं है। इसी आधार पर इन कामों के लिए किसी को किराये पर रखना जायज़ नहीं है, क्योंकि ये उस पर फ़र्ज़ हैं। लेकिन यदि इबादत का लाभ करने वाले से आगे तक पहुँचता है, तो उस पर किराये का अनुबंध जायज़ है। उदाहरण के लिए दूसरों के लिए अज़ान देना और दूसरों को नमाज़ पढ़ाना, या किसी मृत व्यक्ति की ओर से हज करने के लिए किसी को रखना, या उसकी ओर से ज़कात अदा करने के लिए किसी को रखना। ये सभी जायज़ हैं, क्योंकि यह किसी लाभ के बदले में किया गया अनुबंध है। इन मामलों में दिया जाने वाला पारिश्रमिक उस लाभ का बदला है जो किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा पूरा किया गया, इसलिए किराये पर रखना जायज़ हुआ। जहाँ तक उस हदीस का संबंध है जिसे तिर्मिज़ी ने उस्मान बिन अबी अल-आस से रिवायत किया, उन्होंने कहा: "नबी ﷺ ने मुझे जो आख़िरी आदेश दिया वह यह था कि ऐसा मुअज़्ज़िन रखना जो अज़ान देने पर पारिश्रमिक न ले।" इस हदीस में नबी ﷺ ने ऐसे मुअज़्ज़िन को रखने से मना किया जो अज़ान के बदले पारिश्रमिक लेता हो, लेकिन उन्होंने मुअज़्ज़िनों के पारिश्रमिक लेने को पूरी तरह मना नहीं किया। इससे संकेत मिलता है कि कुछ मुअज़्ज़िन पारिश्रमिक लेते थे और कुछ नहीं लेते थे। अतः नबी ﷺ ने उन्हें पारिश्रमिक लेने वालों में से मुअज़्ज़िन रखने से रोका। यह निषेध अज़ान पर पारिश्रमिक लेने से दूरी को दर्शाता है, जो इस बात का संकेत है कि अज़ान पर पारिश्रमिक लेना नापसंद है। परंतु यह अज़ान पर पारिश्रमिक लेने की हुरमत को नहीं बताता; बल्कि यह बताता है कि यह जायज़ है, किंतु नापसंदीदा है।