21.6 खराज (भूमि कर)
21.6 The Land Tax (Kharaj)
खराज एक ऐसा हक़ है जिसे अल्लाह (سبحانه وتعالى) ने मुसलमानों के लिए काफ़िरों से लेना जायज़ ठहराया है। यह वह हक़ है जो उस ज़मीन की गर्दन पर लगाया जाता है जिसे काफ़िरों से जंग के ज़रिए या सुलह के ज़रिए जीता गया हो, बशर्ते कि सुलह के समझौते में यह शर्त हो कि ज़मीन हमारी है (यानी मुसलमानों की) और वे उस ज़मीन पर खेती करते रहेंगे, इसके बदले में वे राज्य को खराज अदा करेंगे। अरबी भाषा में खराज का अर्थ किराया और फ़सल या पैदावार होता है। काफ़िरों के साथ जंग का एलान करने के बाद जो भी ज़मीन जीती जाए, वह खराजी ज़मीन मानी जाती है, और अगर जीतने के बाद वे इस्लाम ले आएँ तब भी ज़मीन खराजी ही रहती है। अबू उबैद ने "अल-अमवाल" में अल-ज़ुहरी से रिवायत किया है: "रसूलुल्लाह ﷺ ने बहरीन के मजूसियों से जिज़्या लिया।" अल-ज़ुहरी ने कहा: "जो इस्लाम ले आता, नबी ﷺ उससे (जिज़्या) नहीं लेते थे, और उसका इस्लाम उसकी जान और माल की सुरक्षा करता था, सिवाय ज़मीन के। वह ज़मीन मुसलमानों के लिए माल-ए-ग़नीमत बन जाती थी, क्योंकि वह शुरू में इस्लाम नहीं लाया था जब वह ताक़तवर स्थिति में था", यानी जब वह मुसलमानों की पहुँच से बाहर था। जहाँ तक ज़मीन पर लगाए जाने वाले खराज की मात्रा का सवाल है, यह ज़मीन की क्षमता (पैदावार की ताक़त) के अनुसार तय की जाती है। जब उमर (रज़ि.) ने खराज लगाया, तो उन्होंने ज़मीन की क्षमता का ध्यान रखा, न मालिक के साथ नाइंसाफ़ी की और न किसान के साथ कोई ज़ुल्म किया। कुछ इलाकों में उन्होंने हर जरीब (खेती योग्य ज़मीन का एक टुकड़ा) पर एक क़फ़ीज़ और एक दिरहम लगाया, और दूसरे इलाकों में अलग मात्रा तय की, और शाम (सीरिया) की ज़मीनों पर एक और मात्रा लगाई। यह ज्ञात है कि उन्होंने ज़मीन की क्षमता का ख़्याल रखा। जब खराज ज़मीन की क्षमता के अनुसार तय होता है, तो उसे उसी तरीके से वसूल किया जाएगा जिस तरीके से वह लगाया गया था। अगर खराज ज़मीन के रक़बे (क्षेत्रफल) के आधार पर सालाना लगाया गया हो, तो उसे चंद्र वर्ष के अंत में वसूल किया जाएगा, क्योंकि शरीअत में यही वर्ष मान्य है। लेकिन यदि खराज को भूमि के कृषि-योग्य क्षेत्र पर लगाया गया हो, तो खराज वर्ष के अंत में वसूला जाएगा, क्योंकि यह वर्षा और फसल की बुवाई से संबंधित वर्ष होता है। यदि खराज हिस्सेदारी के रूप में लगाया गया हो, अर्थात भूमि सामान्यतः जितनी उपज देती है उसके अनुसार एक निश्चित अनुमान तय किया गया हो, तो खराज फसल पकने और काटे जाने के समय वसूला जाएगा। इमाम को अधिकार है कि इन तीनों पहलुओं को ध्यान में रखते हुए खराज का अनुमान लगाए, चाहे वह भूमि के क्षेत्रफल पर हो, बोए गए हिस्से के क्षेत्रफल पर हो, या उपज का अनुमान लगाकर हो, जो भी सबसे उचित तरीका हो। यदि भूमि में सुधार किए गए और उनसे उपज बढ़ी, या भूमि पर ऐसे कई कारक पड़े जिनसे उपज घट गई, तो स्थिति की जाँच करनी होगी। यदि वृद्धि किसान द्वारा किए गए किसी कार्य के परिणामस्वरूप हुई हो, जैसे कुआँ या नहर खोदना, तो खराज नहीं बढ़ाया जाएगा। यदि इसके विपरीत कमी उनकी अपनी लापरवाही से हुई हो, जैसे नहर को नष्ट करना या कुएँ की उपेक्षा करना, तो खराज कम नहीं किया जाएगा और उन्हें उस नुकसान की मरम्मत करने का आदेश दिया जाएगा जो उन्होंने पैदा किया। यदि वृद्धि या कमी राज्य के कारण हुई हो, यानी राज्य ने कुआँ खोदा हो, या इसके विपरीत कुओं और नहरों की मरम्मत की उपेक्षा की हो, तो इस स्थिति में राज्य को खराज बढ़ाने का अधिकार है, और जब उपज घटे तो उसे खराज कम भी करना होगा। यदि कमी या वृद्धि प्राकृतिक कारणों से हो, जैसे तूफ़ान से पेड़ों का उखड़ जाना या बाढ़ से नहरों का नष्ट होना, तो इस स्थिति में भूमि पर उसकी संभावित क्षमता के अनुसार खराज लगाया जाएगा, ताकि किसानों के साथ अन्याय न हो। खराज एक निश्चित और ज्ञात अवधि के लिए आँका जाना चाहिए, और उसे स्थायी रूप से तय नहीं किया जाना चाहिए। यह अनुमान तब बदलता है जब अवधि समाप्त होती है, और नई अवधि के लिए नया अनुमान उस समय की भूमि की क्षमता के अनुसार तय किया जाएगा।