3.2 निजी स्वामित्व की परिभाषा
3.2 Definition of Private Ownership
व्यक्तिगत स्वामित्व एक दैवी नियम है, जो किसी संपत्ति या लाभ के रूप में निर्धारित होता है, और जो इसके अनुसार मालिक को उस संपत्ति का उपयोग करने और उसके बदले में प्रतिफल प्राप्त करने का अधिकार देता है। उदाहरण के लिए, यह किसी व्यक्ति का रोटी के एक टुकड़े या किसी घर का स्वामी होना हो सकता है। रोटी के टुकड़े के स्वामित्व के कारण वह उसे खा सकता है या बेच सकता है। इसी प्रकार, घर के स्वामित्व के कारण वह उसमें रह सकता है या उसे बेच सकता है। इन दोनों उदाहरणों में रोटी का टुकड़ा और घर संपत्ति हैं। इनसे संबंधित दैवी नियम शारीअ (विधिकर्ता) की वह अनुमति है कि मनुष्य उन्हें खाकर, उनसे लाभ उठाकर या उनका विनिमय करके उनका उपयोग करे। उपयोग की अनुमति का अर्थ है कि मालिक रोटी खा सकता है, घर में रह सकता है, और उन्हें बेच भी सकता है। रोटी के संबंध में दैवी नियम संपत्ति द्वारा निर्धारित होता है, यानी उसे खाने की अनुमति। घर के संबंध में दैवी नियम लाभ द्वारा निर्धारित होता है, यानी उसमें रहने की अनुमति। इस प्रकार स्वामित्व को शारीअ द्वारा संपत्ति के उपयोग की अनुमति के रूप में परिभाषित किया जाता है। अतः स्वामित्व तभी स्थापित होता है जब शारीअ उसकी अनुमति दे और उसके साधनों की भी अनुमति दे। किसी संपत्ति को स्वामित्व में रखने का अधिकार स्वयं संपत्ति से, या उसकी प्रकृति से, चाहे वह लाभदायक हो या हानिकारक, उत्पन्न नहीं होता। बल्कि वह शारीअ की अनुमति से और उन साधनों की अनुमति से उत्पन्न होता है जो किसी संपत्ति को वैध रूप से स्वामित्व में लाने की अनुमति देते हैं। इसके द्वारा शारीअ कुछ संपत्तियों के स्वामित्व की अनुमति देता है और कुछ के स्वामित्व को निषिद्ध करता है। वह कुछ अनुबंधों की अनुमति देता है और कुछ को निषिद्ध करता है। इस प्रकार शारीअ ने मुसलमानों द्वारा शराब और सूअर के स्वामित्व को निषिद्ध किया, और इस्लामी राज्य के किसी भी नागरिक द्वारा सूद और जुए से अर्जित संपत्ति के स्वामित्व को निषिद्ध किया। उसने बिक्री की अनुमति दी, इसलिए उसे हलाल बनाया, और सूद को निषिद्ध किया, इसलिए उसे हराम बनाया। उसने 'अनान की साझेदारी (शरीर और धन दोनों की साझेदारी) की अनुमति दी और सहकारी समितियों, संयुक्त स्टॉक कंपनियों और बीमा को निषिद्ध किया।