4.1 बंजर भूमि की खेती
4.1 Cultivation of Barren Land
बंजर भूमि (मवात) वह भूमि है जिसका कोई मालिक नहीं होता और जिससे किसी को लाभ नहीं पहुँचता। उसका आबाद करना (इह्या) यानी उस पर खेती करना, वृक्षारोपण करना या उस पर निर्माण करना है। दूसरे शब्दों में, उसका ऐसा कोई भी उपयोग जो आबाद करने के अर्थ में आता हो। किसी व्यक्ति द्वारा भूमि को आबाद करने से वह उसकी संपत्ति बन जाती है। अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "जिसने किसी मृत भूमि को आबाद किया, वह उसी की हो गई।" आपने यह भी फ़रमाया: "जिसने किसी भूमि को बाड़ से घेर लिया, वह उसकी हो गई।" और आपने फ़रमाया: "जिसने किसी चीज़ पर किसी दूसरे मुसलमान से पहले अपना हाथ रख दिया, वह उसी की है।" इस मामले में मुसलमान और धिम्मी (इस्लामी राज्य का गैर-मुस्लिम नागरिक) के बीच कोई अंतर नहीं है, क्योंकि हदीसें अपने रूप में बिना किसी प्रतिबंध के सामान्य हैं, और इसलिए भी कि धिम्मी घाटियों, जंगलों और पहाड़ों की चोटियों के भीतर से जो कुछ लेता है वह उसकी संपत्ति है, और उसे उससे छीनना जायज़ नहीं है। इसी प्रकार मृत भूमि का उसकी संपत्ति होना भी उचित है। यह हर भूमि के लिए सामान्य है, चाहे वह दारुल-इस्लाम हो या दारुल-हर्ब, और चाहे वह उश्री भूमि हो या ख़राजी भूमि। लेकिन कब्ज़े की शर्त यह है कि कब्ज़ा लेने के तीन वर्ष के भीतर उस भूमि पर काम किया जाए, और उसके उपयोग द्वारा इस खेती को जारी रखा जाए। यदि किसी ने अपने कब्ज़े के पहले तीन वर्षों में उसका बिल्कुल उपयोग नहीं किया, या बाद में लगातार तीन वर्ष उसकी उपेक्षा की, तो वह उसकी मिल्कियत का अधिकार खो देगा। उमर इब्न अल-ख़त्ताब ने फ़रमाया: "जो किसी भूमि को घेरता है, तीन वर्ष के बाद उसमें उसका कोई अधिकार नहीं।" उमर ने यह कथन सहाबा की उपस्थिति में दिया और लागू किया, और उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की, जिससे उनकी इज्मा (सर्वसम्मति) की पुष्टि हुई।