4.3 तरजीह की शर्तें
4.3 The conditions of preference
उपर्युक्त शर्तें ही ख़लीफ़ा के नियुक्त होने के लिए आवश्यक अनुबंधात्मक शर्तें हैं। ऊपर बताई गई सात शर्तों के अतिरिक्त कोई भी अन्य शर्त ख़िलाफ़त के अनुबंध के लिए अनिवार्य पूर्वशर्त नहीं है। हालाँकि ऐसी शर्तें, यदि उनसे संबंधित नस (पाठ) प्रमाणित हों, या यदि वे किसी ऐसे नियम के अंतर्गत सूचीबद्ध हों जो सहीह (प्रामाणिक) नस से सिद्ध हो, तो वे केवल श्रेष्ठता की शर्तें होंगी। कोई शर्त अनुबंधात्मक बनने के लिए उसके पक्ष में ऐसा प्रमाण होना चाहिए जिसमें उसके अनिवार्य होने का संकेत देने वाला निश्चयात्मक आदेश (तलब जाज़िम) हो। यदि प्रमाण में निश्चयात्मक आदेश न हो तो वह शर्त केवल श्रेष्ठता की शर्त रह जाती है। उन सात शर्तों के सिवा निश्चयात्मक आदेश वाला कोई प्रमाण नहीं मिला; इसलिए वही अनुबंधात्मक शर्तें हैं। शेष शर्तें, जिनमें कोई नियम सहीह रूप से प्रमाणित है, केवल श्रेष्ठता की शर्तें हैं। अतः यह शर्त कि ख़लीफ़ा मुज्तहिद हो, अनुबंधात्मक शर्त नहीं है, क्योंकि इसे निश्चयात्मक आदेश वाले किसी नस ने प्रमाणित नहीं किया। इसके अतिरिक्त, ख़लीफ़ा का कर्तव्य शासन करना है, अतः उसे अपने स्वयं के इज्तिहाद की आवश्यकता नहीं; वह किसी फ़तवे के बारे में पूछ सकता है या किसी मुज्तहिद के मतों का पालन कर सकता है और तक़लीद के आधार पर मत अपना सकता है, इसलिए उसका मुज्तहिद होना आवश्यक नहीं। हाँ, उसका मुज्तहिद होना बेहतर है, परंतु यदि वह न हो तब भी उसकी ख़िलाफ़त का अनुबंध हो जाएगा। ख़लीफ़ा का बहादुर होना, चतुर राजनीतिज्ञ या लोगों के मामलों के प्रबंधन में निपुण होना आवश्यक नहीं, क्योंकि इन शर्तों के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं है, और न ही ये किसी ऐसे शरई नियम के अंतर्गत आती हैं जो इन्हें अनुबंधात्मक शर्तें बनाए। फिर भी, दूरदर्शिता और सुविचारित राय के साथ बहादुर होना ख़लीफ़ा के लिए बेहतर है। इसी प्रकार ख़लीफ़ा का क़ुरैश से होना भी अनिवार्य नहीं है। जहाँ तक उस बात का संबंध है जो अल-बुख़ारी ने मुआविया (रज़ि.) से रिवायत की है कि उन्होंने कहा: मैंने अल्लाह के रसूल ﷺ को यह फ़रमाते हुए सुना: