10.3 ख़लीफ़ा को गवर्नरों के कार्यों के बारे में पूछताछ करनी चाहिए
10.3 The Khaleefah should make enquiries about the works of the governors
ख़लीफ़ा को वालियों (गवर्नरों) के कार्यों की जानकारी लेनी चाहिए और उन पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए। उसे किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करना चाहिए जो उनके हालात की जाँच कर सके और निरीक्षण (inspections) कर सके। ख़लीफ़ा को उनमें से सबसे, या कुछ से, समय-समय पर मुलाक़ात भी करनी चाहिए और उनके विरुद्ध प्रजा की शिकायतें सुननी चाहिए।
The Khaleefah should inquire about the actions of the Waali and He should monitor them closely. He should appoint someone, who can check their state of affairs and carry out inspections. The Khaleefah should also meet with all of them or some of them from time to time and listen to the complaints of the subjects against them.
यह सिद्ध हो चुका है कि अल्लाह के रसूल ﷺ जब वुलात (शासकों/गवर्नरों) को नियुक्त करते थे तो उनकी परख किया करते थे, जैसा उन्होंने मुआज़ और अबू मूसा के साथ किया। वे उन्हें समझाते थे कि उन्हें अपने कर्तव्यों का निर्वहन कैसे करना चाहिए, जैसा उन्होंने 'अम्र बिन हज़्म के साथ किया। उन्होंने उनका ध्यान कुछ महत्वपूर्ण बातों की ओर भी दिलाया, जैसा उन्होंने अबान बिन सईद के साथ किया, जब उन्हें बहरैन का वाली नियुक्त किया और उनसे कहा:ﷺ
It has been confirmed that the Messenger of Allah (pbuh) would examine the Wulah when appointing them, as He did with Mu’az and Abu Moussa. He used to explain to them how they should conduct their duties, as He did with ‘Amr bin Hazm. He also drew their attention to some important matters as He did with Aban bin Sa’id when He appointed Him Waali over Bahrain and said to him:
“अब्द क़ैस का ख़याल रखना और उनके सरदारों का सम्मान करना।” इसी तरह यह भी साबित है कि नबी ﷺ वुलात (गवर्नरों/अधिकारियों) से हिसाब लेते थे, उनके हालात का जायज़ा लेते थे और उनके बारे में आने वाली ख़बरें सुनते थे। आप ﷺ वुलात से उनकी वसूली और ख़र्च किए गए माल का हिसाब माँगते थे। इमाम अल-बुख़ारी और मुस्लिम ने अबू हुमैद अस-साइदी से रिवायत किया, जिन्होंने कहा: “अल्लाह के रसूल ﷺ ने इब्नुल-उतबिय्या को बनू सुलैम के सदक़ात पर आमिल (वसूली अधिकारी) नियुक्त किया। जब वह लौटे और रसूल ﷺ ने उनसे हिसाब लिया, तो उन्होंने कहा: ‘यह आपके लिए है और यह (तोहफ़ा) है जो मुझे दिया गया।’ तो अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: ‘तुम अपने बाप और माँ के घर ही क्यों न बैठे रहे, ताकि अगर तुम सच्चे हो तो तोहफ़ा तुम्हारे पास आता?’ फिर अल्लाह के रसूल ﷺ मिम्बर पर खड़े हुए, लोगों को संबोधित किया, अल्लाह की हम्द व सना की और फ़रमाया: ‘उस सरकारी अधिकारी का क्या हाल है जिसे मैं कोई ज़िम्मेदारी सौंपता हूँ, और वह आकर कहता है: “यह आपके लिए है और यह मुझे तोहफ़े में दिया गया है”? वह अपने बाप या अपनी माँ के घर ही क्यों न बैठा रहा, ताकि अगर वह सच्चा है तो उसका तोहफ़ा उसके पास आता? अल्लाह की क़सम! तुम में से कोई भी उसमें (सदक़ा में) से नाजायज़ तौर पर कुछ नहीं लेगा, मगर वह उसे क़ियामत के दिन इस हाल में लाएगा कि उसकी गर्दन पर एक ऊँट चिंघाड़ रहा होगा, या एक गाय डकार रही होगी, या एक बकरी मिमिया रही होगी।’ फिर आप ﷺ ने अपने हाथ इतने ऊँचे उठाए कि मैंने आपकी बग़लों की सफ़ेदी देखी। फिर आप ﷺ ने दो बार फ़रमाया: ‘ऐ अल्लाह, मैंने तेरा हुक्म पहुँचा दिया।’” उमर (रज़ि.) वुलात पर कड़ी निगरानी रखते थे, और उन्होंने मुहम्मद बिन मस्लमा को उनके हालात की जाँच और उनका निरीक्षण करने के लिए नियुक्त किया। उमर (रज़ि.) हज के मौसम में वुलात को जमा करते थे ताकि उनके काम का जायज़ा लें और उनके बारे में रियाया की शिकायतें सुनें, और वह उनके साथ विलायात (प्रांतों/इलाक़ों) के मामलों पर बात करते और उनसे उनके अपने हालात भी पूछते थे। रिवायत किया गया है कि 'उमर ने एक बार अपने आस-पास के लोगों से कहा: "क्या तुम कहोगे कि मेरी ज़िम्मेदारी पूरी हो गई अगर मैं तुम पर तुम्हारे बीच के सबसे अच्छे व्यक्ति को नियुक्त कर दूँ और उसे इंसाफ़ करने का आदेश दे दूँ?" उन्होंने कहा: "हाँ।" उन्होंने कहा: "नहीं। जब तक मैं उसके कामकाज की जाँच न कर लूँ और न देख लूँ कि उसने वह किया या नहीं जो मैंने उसे करने का आदेश दिया था।" 'उमर वुलाह (गवर्नरों) और आमिलीन (कर्मचारियों) का हिसाब लेने में सख़्त माने जाते थे। वे कुछ को केवल शक के आधार पर, बिना पक्के सबूत के, हटा दिया करते थे। वे किसी वाली को उस मामूली शक पर भी हटा देते थे जो शक के दर्जे तक भी न पहुँचता हो। एक दिन उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा: "एक अमीर को दूसरे से बदल देना आसान है, ताकि लोगों के मामले सुधारे जा सकें।" लेकिन उनकी सख़्ती के बावजूद वे उन्हें शासन में खुली छूट देते थे और उनकी इज़्ज़त की रक्षा करते थे। वे उनकी बात सुनते और उनकी दलीलों पर विचार करते थे। यदि कोई दलील उन्हें पसंद आती तो वे उसकी स्वीकृति और विश्वास ज़ाहिर करते और बाद में आमिल की प्रशंसा करते। एक दिन उन तक ख़बर पहुँची कि उनके आमिल उमैर इब्न सअद ने हिम्स के मिंबर पर खड़े होकर कहा: "इस्लाम तब तक शक्तिशाली रहेगा जब तक सत्ता मज़बूत है। और सत्ता की मज़बूती तलवार से क़त्ल करने या कोड़े मारने से नहीं आती, बल्कि सच्चाई से फ़ैसला करने और इंसाफ़ क़ायम रखने से आती है।" यह सुनकर 'उमर ने कहा: "काश मेरे पास उमैर इब्न सअद जैसा कोई व्यक्ति होता जो मुसलमानों के मामलों में मेरी मदद करता।"