अनुच्छेद 91
Article 91
मज़ालिम की अदालत (मज़ालिम) को किसी भी ज़ुल्म (मज़लमा) के मामले की जाँच करने का अधिकार है, चाहे वह मामला राज्य के अधिकारियों से जुड़ा हो, राज्य के प्रमुख का शरीअत के नियमों से विचलन हो, संविधान में विधायी ग्रंथों की व्याख्या हो, राज्य प्रमुख द्वारा अपनाए गए ढाँचे के भीतर क़ानून (क़ानून) और अन्य शरई नियमों की व्याख्या हो, कोई कर (टैक्स) लगाया जाना हो, या कुछ और।
The Court of Injustice Acts (Madhalim) has the authority to investigate any case of injustice (Madhlamah), irrespective of whether it is related to officials of the State, the Head of State’s deviation from the Shari’ah rules, interpretation of the legislative texts in the constitution, law (Qanun) and other Shari’ah rules within the framework adopted by the Head of State, or the imposition of a tax, or anything else.
इसका प्रमाण यह है कि रसूल ﷺ ने शासक द्वारा मूल्य-निर्धारण (तस्अीर) को ज़ुल्म (मज़लमह) माना, और राज्य की व्यवस्था द्वारा सार्वजनिक पानी से अपनी ज़मीन सींचने के लोगों का क्रम तय करने को उस मामले के रूप में देखा जो ज़ुल्म (मज़लमह) तक ले जा सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि शासक का वह कार्य जो सत्य या शरीअत के नियमों के विरुद्ध हो, वह ज़ुल्म (मज़लमह) है, यदि वह ख़लीफ़ा (राज्य-प्रमुख) से संबंधित हो, क्योंकि रसूल ﷺ स्वयं राज्य-प्रमुख थे। और यदि वह राज्य के अधिकारियों से संबंधित हो तो भी वह ज़ुल्म (मज़लमह) होगा, क्योंकि वे राज्य-प्रमुख के प्रतिनिधि हैं, अतः यह भी ख़लीफ़ा से संबंधित होगा, क्योंकि यह उस कार्य से संबंधित है जिसके लिए उन्हें प्रतिनिधि बनाया गया था, न कि स्वयं उनकी व्यक्तिगत हैसियत से। इस प्रकार मूल्य-निर्धारण से संबंधित यह वृत्तांत इस बात का प्रमाण है कि राज्य-प्रमुख का उल्लंघन ज़ुल्म (मज़लमह) है, और मज़ालिम की अदालत (कोर्ट ऑफ़ इंजस्टिसेज़, मज़ालिम) वह संस्था है जिसे ज़ुल्म (मज़ालिम) की जाँच करने का अधिकार है, और यही लेख के पहले भाग का प्रमाण है।