अनुच्छेद 83
Article 83
कोई अपील न्यायालय नहीं है, और न ही कोई कैसेशन न्यायालय है, इसलिए जहाँ तक मामलों के निपटारे की विधि का संबंध है, न्यायपालिका एक ही स्तर की है। यदि न्यायाधीश ने कोई फैसला सुना दिया, तो वह बाध्यकारी हो जाएगा, और उसे किसी दूसरे न्यायाधीश के फैसले से कभी रद्द नहीं किया जा सकता, सिवाय इसके कि उसने इस्लाम के अलावा किसी और विधान के अनुसार फैसला दिया हो, या कुरआन, सुन्नत अथवा सहाबा के इज्मा' के किसी निश्चित पाठ के विरुद्ध फैसला दिया हो, या यह स्पष्ट हो जाए कि उसने ऐसा फैसला दिया जो मामले की वास्तविक स्थिति के विपरीत था।
There is no court of appeal, and no court of cassation, so the judiciary, as far as the method by which the cases are treated, is of a single level. If the judge pronounced a verdict, it would become binding, and it cannot ever be annulled by the verdict of another judge unless he ruled by other than Islam, or contradicted a definite text from the Quran, Sunnah or Ijmaa’ of the companions, or it became clear that he gave a verdict that contradicted the reality of the situation.
यह लेख बताता है कि किसी न्यायाधीश के फ़ैसले को न तो स्वयं वह और न ही कोई अन्य न्यायाधीश रद्द कर सकता है। इस बात का प्रमाण कि न्यायाधीश के फ़ैसले को रद्द नहीं किया जाता, यह है कि सहाबा का इस पर इज्मा' था। अबू बक्र (रज़ि.) ने मामलों में अपने इज्तिहाद के अनुसार फ़ैसले दिए, और उमर (रज़ि.) ने उनसे मतभेद किया, परन्तु उनके फ़ैसलों को रद्द नहीं किया। और अली (रज़ि.) ने अपने इज्तिहाद में उमर (रज़ि.) से मतभेद किया, परन्तु उनके फ़ैसलों को भी रद्द नहीं किया। और अली (रज़ि.) ने अबू बक्र (रज़ि.) और उमर (रज़ि.) दोनों से मतभेद किया और उनके फ़ैसलों को रद्द नहीं किया। नजरान के लोग अली (रज़ि.) के पास आए और बोले, "ऐ अमीरुल मोमिनीन, फ़ैसला आपके हाथ में है और आपकी माफ़ी आपकी अपनी ज़बान पर है।" उन्होंने कहा, "तुम पर अफ़सोस! उमर सही मार्ग पर थे, और मैं उमर के सुनाए हुए फ़ैसले को पलटूँगा नहीं।" यह रिवायत है कि उमर (रज़ि.) ने साझा विरासत (हज्जतुल मुशतरका) में फ़ैसला दिया कि सगे भाइयों के अधिकार सौतेले भाइयों की वजह से समाप्त हो जाते हैं। फिर उन्होंने आदेश दिया कि उन्हें भी हिस्सा दिया जाए, और फिर कहा, "वह फ़ैसला उस मामले पर लागू होता है और यह फ़ैसला इस मामले पर लागू होता है," और उन्होंने विरोधाभास के बावजूद दोनों फ़ैसले लागू किए। इसका उल्लेख इब्न कुदामा ने अल-मुग़नी में और अल-बैहक़ी ने अल-हकम बिन मसऊद अस-सक़फ़ी से किया है। उन्होंने दादा के संबंध में भी भिन्न फ़ैसला दिया, और उन्होंने पहले के किसी भी फ़ैसले को कभी नहीं पलटा, जैसा कि अल-बैहक़ी ने अस-सुनन अल-कुबरा में उल्लेख किया है।