अनुच्छेद 76
Article 76
ख़लीफ़ा न्यायपालिका में एक मुख्य न्यायाधीश (क़ाज़ी अल-क़ुज़ात) नियुक्त करता है, जो पुरुष, वयस्क, स्वतंत्र, मुसलमान, बुद्धिमान और न्यायप्रिय हो तथा फ़िक़्ह का ज्ञान रखता हो। यदि उसे मज़ालिम के न्यायाधीश को नियुक्त और पदच्युत करने का अधिकार दिया गया हो, और मज़ालिम में निर्णय देने का अधिकार भी हो, तो उसे मुज्तहिद होना आवश्यक होगा। उसे प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत न्यायाधीशों को नियुक्त करने, उन पर अनुशासन लागू करने और उन्हें पद से हटाने का अधिकार होगा। अदालतों के शेष सरकारी कर्मचारियों का संबंध उस विभाग प्रबंधक से होगा जो अदालतों के मामलों के लिए उत्तरदायी है।
The Khalifah appoints a supreme judge to the judiciary from the male, adult, free, Muslim, sane, just people who know jurisprudence, and if he was given the power to appoint and remove the Madhalim judge, and had the power of judgement in the Madhalim, then he would have to be a Mujtahid. He would have the power to appoint judges, discipline them, and remove them as part of the administrative systems. As for the remainder of the civil servants of the courts, they are connected to the Department Manager who is responsible for the courts’ affairs.
मूल रूप से यह है कि ख़लीफ़ा राज्य के सभी भागों में किसी एक विषय पर विशेष रूप से किसी गवर्नर की नियुक्ति कर सकता है, जैसे वह किसी विशेष स्थान पर किसी एक विषय पर विशेष गवर्नरशिप के लिए गवर्नर नियुक्त कर सकता है, ठीक वैसे ही जैसे वह किसी विशेष स्थान पर सामान्य गवर्नरशिप के लिए गवर्नर नियुक्त कर सकता है। अतः जैसे ख़लीफ़ा जिहाद के लिए एक नेता को, हज के लिए एक नेता को, और भूमि-कर के ऊपर एक नेता को अधिकार दे सकता है, वैसे ही वह न्यायपालिका के लिए भी एक नेता को अधिकार दे सकता है। वह उस नेता को न्यायाधीशों की नियुक्ति, उन्हें हटाने और उन पर अनुशासन लागू करने का अधिकार दे सकता है, जैसे वह जिहाद के नेता को सैनिकों पर मेजरों और कॉर्पोरलों की नियुक्ति, उन पर अनुशासन और उन्हें हटाने का अधिकार दे सकता है। इसी कारण ख़लीफ़ा के लिए एक प्रमुख न्यायाधीश, यानी न्यायपालिका के ऊपर एक नेता, नियुक्त करना जायज़ है। यह प्रमुख न्यायाधीश, या न्यायपालिका का नेता, एक शासक होगा न कि सरकारी कर्मचारी, क्योंकि वह एक गवर्नर है जिसने एक गवर्नरशिप यानी शासन का दायित्व उठाया है, ठीक वैसे ही जैसे कोई भी नेता या गवर्नर किसी भी विषय पर होता है। फिर भी उसे न्यायपालिका में ख़लीफ़ा का सहायक नहीं माना जाता, क्योंकि उसे एक विशेष नियुक्ति दी गई है, यानी न्यायपालिका के सभी विषयों में, और इसलिए उसकी नियुक्ति न्यायपालिका में ही है और उससे आगे नहीं जाती। जहाँ तक सहायक की बात है, उसे सभी विषयों में सामान्य नियुक्ति दी जाती है, इसलिए ख़लीफ़ा सभी विषयों में उसकी सहायता माँग सकता है, जबकि प्रमुख न्यायाधीश केवल न्यायपालिका में ही सहायता कर सकता है।