32 इस्लामी राज्य की निरंतरता
32 The Continuity of the Islamic State
जब अल्लाह के रसूल ﷺ का देहांत हो गया, तो सहाबा ने सर्वसम्मति से राज्य के प्रमुख के रूप में उनकी जगह लेने के लिए ख़लीफ़ा को बैअत देने पर सहमति जताई। मुसलमान हिजरी 1342 यानी ईसवी 1924 तक ख़ुलफ़ा नियुक्त करते रहे। वे इस व्यक्ति को अमीरुल-मोमिनीन या केवल इमाम भी कहते थे।
Once the Messenger of Allah (pbuh) died, the Sahabah unanimously agreed on giving the Bay’ah to the Khaleefah to replace him (pbuh) as the head of State. The Muslims continued appointing the Khulafah until the year 1342 Hijri, i.e. 1924 CE. They also called this man Amir al-Mu’mineen or just simply the Imam.
कोई भी मुसलमान बैअत के बिना ख़लीफ़ा नहीं बनता, और इस्लामी राज्य अपने शासन के अंतिम दिनों तक इस नियम पर चलता रहा। बैअत के तरीक़े में भिन्नता रही। कुछ मामलों में ख़लीफ़ा को सीधे बैअत दी गई। कुछ ख़ुलफ़ा ने अपने रिश्तेदारों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति की सिफ़ारिश की। कुछ ने यह पद अपने बेटों या परिवार के अन्य सदस्यों को सौंपा। और कुछ ने अपने परिवार से एक से अधिक व्यक्तियों की सिफ़ारिश की। परंतु यह सिफ़ारिश उन्हें ख़लीफ़ा बनाने के लिए काफ़ी नहीं थी; पद सँभालने से पहले उन्हें बैअत प्राप्त करनी पड़ती थी। कोई भी ख़लीफ़ा बिना बैअत के नियुक्त नहीं हुआ। बैअत लेने का तरीक़ा भी अलग-अलग रहा। यह अहल अल-हल्ल वल-अक़्द (प्रमुख और विशिष्ट व्यक्ति, भाषाई रूप से वे लोग जो बाँधते और खोलते हैं) से ली जाती थी; यह आम लोगों से भी ली जाती थी; और कुछ मामलों में यह शैख़ अल-इस्लाम (प्रमुख विद्वान) से ली जाती थी। कुछ ऐसे अवसर भी आए जब बैअत लेने में दुरुपयोग हुआ। फिर भी वह एक वैध बैअत थी, न कि केवल ख़िलाफ़त, यानी ख़लीफ़ा के पद, का सीधा उत्तराधिकार।