3 पुरुष और स्त्री के संबंधों का नियमन
3 Regulating the Relations between Man and Woman
यह तथ्य कि स्त्री पुरुष में और पुरुष स्त्री में प्रजनन की प्रवृत्ति (नस्ल बढ़ाने की प्रवृत्ति) को उत्तेजित करती है, इसका अनिवार्य अर्थ यह नहीं कि जब भी कोई पुरुष किसी स्त्री से मिलेगा तो यह उत्तेजना अवश्य मौजूद होगी। बल्कि इसका अर्थ यह है कि मूल रूप से वे एक-दूसरे में यह प्रवृत्ति उत्तेजित करने की संभावना रखते हैं, जब वे मिलें, और इसका परिणाम यौन संबंध हो सकता है। परंतु वे मिल सकते हैं और यह प्रवृत्ति उत्तेजित न हो, जैसे व्यापार के लिए मिलने पर, या किसी मरीज़ का ऑपरेशन करने के लिए मिलने पर, या ज्ञान की सभाओं में भाग लेने के लिए मिलने पर, आदि। इन सभी स्थितियों और अन्य में भी यौन प्रवृत्ति को उत्तेजित करने की संभावना बनी रहती है। परंतु संभावना का मौजूद होना उत्तेजना का मौजूद होना नहीं है। उत्तेजना तब पैदा होती है जब वे एक-दूसरे को मानव जाति की रक्षा के दृष्टिकोण के बजाय स्त्री-पुरुष के दृष्टिकोण से देखते हैं। इसलिए स्त्री और पुरुष का एक-दूसरे में यह प्रवृत्ति उत्तेजित करना इस बात का कारण नहीं बनना चाहिए कि स्त्री को पुरुष से पूरी तरह अलग कर दिया जाए। दूसरे शब्दों में, प्रजनन प्रवृत्ति उत्तेजित होने की संभावना को इस आधार पर स्त्री-पुरुष के सार्वजनिक जीवन में एक साथ मिलने और आपस में सहयोग करने से रोकना गलत है। बल्कि उन्हें सार्वजनिक जीवन में मिलना चाहिए और आपस में सहयोग करना चाहिए, क्योंकि उनका सहयोग समाज और सार्वजनिक जीवन के लिए आवश्यक है। परंतु ऐसा सहयोग उस व्यवस्था के बिना संभव नहीं जो उनके बीच के संबंधों को नियमित करे। यह व्यवस्था इस दृष्टिकोण से निकलनी चाहिए कि स्त्री और पुरुष का संबंध मानव जाति की रक्षा के लिए है। इस व्यवस्था के द्वारा सार्वजनिक जीवन में स्त्री-पुरुष का मिलना और उनके बीच सहयोग संभव और सुरक्षित हो जाता है।